दिल्ली विधानसभा के चुनाव नजदीक हैं। पांच फरवरी को मतदान है। आठ फरवरी को चुनाव के नतीजे आ जाएंगे। दिल्ली की नयी सरकार का गठन होगा। लेकिन दिल्ली में एक वक्त ऐसा भी था जब दिल्ली में ना तो कोई मुख्यमंत्री होता था और ना ही दिल्ली विधानसभा का अस्तित्व था। सन् 1956 से लेकर सन् 1993 तक दिल्ली में कोई विधानसभा नहीं थी।
सीट एक, विधायक दो – दिल्ली का पहला चुनाव
आजादी के बाद दिल्ली विधानसभा अस्तित्व में आयी थी। ये निर्धारित किया गया था कि दिल्ली विधानसभा में 48 सीटें होंगी। तब व्यवस्था ऐसी थी कि कुछ सीटों पर दो विधायक निर्वाचित हो सकते थे। इस तरह दिल्ली की कई सीटों पर दो-दो एमएलए चुने गए। दिल्ली विधानसभा का गठन 17 मार्च 1952 को पार्ट-सी राज्य सरकार अधिनियम-1951 के तहत पहली बार किया गया था। 1952 में ही दिल्ली का पहला विधानसभा चुनाव हुआ था। तब कांग्रेस ने भारी बहुमत से ये चुनाव जीता था। उसने 36 सीटें अपने नाम की थीं। करीब 52 फीसदी वोट कांग्रेस को मिले थे। दिल्ली के पहले चुनाव में छह सीटें ऐसी थीं, जिन पर दो एमएलए चुने गए थे।

रीडिंग रोड, रहगन पुरा देव नगर, सीताराम बाजार तुर्कमान गेट, पहाड़ी धीरज बस्ती जुलाहा, नरेला और महरौली सीट से दो-दो सदस्य विधानसभा पहुंचे थे। इनमें से रीडिंग रोड ऐसी सीट थी, जहां से कांग्रेस और जनसंघ दोनों के ही उम्मीदवार चुने गए थे। एक सीट पर दो विधायकों के चुने जाने की बात से आज आपको अचंभा होगा, लेकिन तब ये प्रयोग किया गया था। चौधरी ब्रह्म प्रकाश दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन 1955 में उन्हें हटना पड़ा था। इसके बाद गुरमुख निहाल सिंह ने उनकी जगह ली थी। लेकिन राज्य पुनर्गठन आयोग की अनुशंसा के बाद एक नवंबर 1956 से दिल्ली विधानसभा का अस्तित्व समाप्त कर दिया गया। इसके बाद दिल्ली केन्द्र शासित राज्य बन गयी।
दिल्ली में मेट्रोपॉलिटन काउंसिल का गठन
लेकिन दिल्ली के लोगों को अपने निर्वाचित प्रतिनिधि चुनने का अधिकार देने की मांग बनी रही। इसी के तहत एक दिल्ली के लोगों को एक सांकेतिक प्रतिनिधित्व देने के लिए दिल्ली एडमिनिस्ट्रेटिव एक्ट,1966 लागू हुआ। इसके तहत दिल्ली में मेट्रोपॉलिटन काउंसिल का गठन किया गया। इसमें ये तय हुआ कि दिल्ली में मेट्रोपॉलिटन काउंसिल के 56 निर्वाचित और 5 मनोनीत सदस्य होंगे। दिल्ली के लोग 56 निर्वाचित सदस्यों का चुनाव करेंगे। लेकिन मेट्रोपॉलिटन काउंसिल के पास कोई विधायी शक्ति नहीं थी। ये सिर्फ सलाहकार के तौर पर काम कर सकती थी। सभी शक्तियां लेफ्टिनेंट गवर्नर या एडमिनिस्ट्रेटर के पास दी गयी, जिसकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति करते थे।
लेकिन मेट्रोपॉलिटन काउंसिल के पास कोई विधायी शक्ति न होने के कारण एक पूर्ण विधानसभा की मांग दिल्ली में उठती रही।
सरकारिया कमिटि ने की राह प्रशस्त
सन् 1984 में राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। तब तक दिल्ली की जनसंख्या 50 लाख के पार पहुंच चुकी थी। ये महसूस किया जाना लगा था कि इतनी बड़ी जनसंख्या को अपना पूर्ण प्रतिनिधि चुनने का अधिकार मिलना चाहिए। राजीव गांधी भी इस मांग से सहमत थे। इसके बाद इस दिशा में पहल करते हुए 24 दिसंबर 1987 को सरकारिया कमिटि का गठन किया गया। इसे बाद में बालकृष्ण कमिटि के नाम से जाना गया। कमिटि ने दिल्ली के प्रशासन से संबंधित विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया। कमिटि ने अपनी रिपोर्ट 14 दिसंबर 1989 को सौंपी। कमिटि ने अपनी रिपोर्ट में कहां कि दिल्ली के केन्द्र शासित स्वरुप को बरकरार रखा जाना चाहिए। लेकिन कमिटि ने दिल्ली में विधानसभा के गठन की भी बात कही जिसे आम लोगों की समस्याओं के निदान के पूर्ण अधिकार प्राप्त हो। कमिटि ने ये भी प्रस्ताव रखा कि इस व्यवस्था को स्थायित्व देने के लिए संविधान में संशोधन करके दिल्ली को अन्य केन्द्र शासित राज्यों से अलग एक स्पेशल स्टेटस प्रदान किया जाए।
हालांकि बालकृष्ण कमिटि की रिपोर्ट आने के पहले ही राजीव गांधी की सरकार चली गयी थी। 2 दिसंबर 1989 को वी. पी. सिंह भारत के प्रधानमंत्री बने। फिर 10 नवंबर 1990 को चंद्रशेखर भारत के नए प्रधानमंत्री बने। ऐसे में राजनीतिक उठापटक के उस दौर में बालकृष्ण कमिटि के प्रस्ताव पर अमल नहीं हो सका। साल 1989 में हुए आम चुनाव के 16 महीने बाद ही नौंवी लोकसभा भंग कर दी गयी। 1991 में 10वीं लोकसभा के लिए आम चुनाव की घोषणा हो गयी। 21 मई 1991 को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की वोटिंग के पहले चरण के ठीक एक दिन बाद हत्या कर दी। 15 दिन चुनाव टालने के बाद 12 जून और 15 जून को दूसरे और तीसरे चरण का मतदान हुआ। कांग्रेस ने इस चुनाव के बाद सरकार बनायी। 21 जून 1991 को कांग्रेस के पी. वी. नरसिंह राव ने प्रधानमंत्री के रुप में शपथ ली। इस बीच दिल्ली विधानसभा के गठन का प्रस्ताव ठंडे बस्ते में पड़ा रहा।
69वां संविधान संशोधन
नयी सरकार बनने के बाद इस प्रस्ताव पर फिर चर्चा शुरु हुई। दिल्ली विधानसभा के गठन की पहल राजीव गांधी ने की थी। ऐसे में नरसिंह राव सरकार ने इस प्रस्ताव पर काम आगे बढ़ाया। इसके बाद 69वें संविधान संशोधन के जरिए दिल्ली में एक विधानसभा के गठन का मार्ग प्रशस्त किया गया। संविधान में दो नए आर्टिकल जोड़े गए – 239 AA और 239 AB। 69वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1991 ने केन्द्र शासित प्रदेश दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के रुप में नामित किया। इसने राज्य के लिए एक राज्य विधानसभा और मंत्री परिषद बनायी। इसके जरिए दिल्ली को अपनी विधानसभा मिली। दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों में 12 रिजर्वड सीटें हैं।
किसकी-किसकी बनी सरकार
इसके बाद 1993 में दिल्ली विधानसभा के चुनाव हुए। बीजेपी ने इस चुनावों में जीत हासिल की। बीजेपी के मदन लाल खुराना नयी विधानसभा के पहले मुख्यमंत्री बने। लेकिन हवाला कांड में नाम आने के बाद मदनलाल खुराना को हटना पड़ा और साहिब सिंह वर्मा दिल्ली के ऩए मुख्यमंत्री बने। फिर दिल्ली में प्याज की बढ़ती कीमतें मुद्दा बन गयी। साथ ही सरसों तेल में मिलावट की खबरों की वजह से भी सरकार की किरकरी हुई। बीजेपी ने साहिब सिंह वर्मा को हटाकर सुषमा स्वराज को दिल्ली की नयी मुख्यमंत्री बनाया। सुषमा स्वराज करीब डेढ़ महीने मुख्यमंत्री पद पर रही। फिर उनके नेतृत्व में पार्टी ने चुनाव लड़ा।

लेकिन इस बार कांग्रेस ने सरकार बनायी। शीला दीक्षित दिल्ली की नयी मुख्यमंत्री बनी। अगले दो चुनाव भी शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस ने जीते। इसके बाद कॉमनवेल्थ घोटाले की वजह से कांग्रेस सरकार की काफी बदनामी हुई। तब तक अन्ना आंदोलन भी जोर पकड़ने लगा था। 2013 में हुए चुनाव में कांग्रेस बाहर हो गयी। शीला दीक्षित को खुद हार का सामना करना पड़ा। आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि 50 दिनों के अंदर ही उनको इस्तीफा देना पड़ा। दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगा। लेकिन 2015 में हुए चुनाव में आम आदमी पार्टी ने जबरदस्त बहुमत हासिल किया। उसे 70 में 67 सीटों पर जीत हासिल हुई। केजरीवाल मुख्यमंत्री बने। इसके बाद 2020 में भी आम आदमी पार्टी की सरकार बनी और अरविंद केजरीवाल ही मुख्यमंत्री बने। लेकिन विरोधाभास ये है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार बनाने वाले केजरीवाल इस बार खुद भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे हैं।
–अमित शर्मा